Holy sprictures

Wednesday, May 13, 2020

नास्तिकता


नास्तिकता


नास्तिक लोग ईश्वर (भगवान) के अस्तित्व का स्पष्ट प्रमाण न होने कारण झूठ करार देते हैं। अधिकांश नास्तिक किसी भी देवी देवता, परालौकिक शक्ति, धर्म और आत्मा को नहीं मानते।नास्तिकों का कहना यह है कि ईश्वर में विश्वास करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
जगत् में इतनी मारकाट, इतना नाश और ध्वंस तथा इतना दु:ख और अन्याय दिखाई पड़ता है कि इसका संचालक और पालक कोई समझदार और सर्वशक्तिमान् और अच्छा भगवान नहीं माना जा सकता



🤗आज हम बताएंगे कि हम  सभी जो भक्ति करते है वह क्या सही है

1 क्या श्राद्ध निकलना उचित है ?

 नही| क्यों आइये जानते है सूक्ष्म वेद के अनुसार

‘‘श्राद्ध-पिण्डदान करें या न करें’’
वाणी सँख्या 3:- जीवित बाप से लठ्ठम-लठ्ठा, मूवे गंग पहुँचईयाँ।जब आवै आसौज का महीना, कऊवा बाप बणईयाँ।।3।।

 अंध श्रद्धा.... सदियाँ गुजर जायेगी इनको इससे बाहर निकालने में!

👉नास्तिकों का कहना यह है कि ईश्वर में विश्वास करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।  जब कि यह प्रमाणित हो जाए कि कभी सृष्टि की उत्पत्ति हुई होगी।

जो लोग वेद को परम प्रमाण नहीं मानते वे नास्तिक कहलाते हैं। आज हम अपने वेद धर्म शाश्त्रो  को आधार मन कर पुख्ता प्रमाणों  से सिद्ध करते है कि  भगवान कबीर साहेब  है जिन्होंने जीव  जंतु  मनुष्यो की उत्पति की और पूरी दुनिया को बनाया  !




पवित्रात्माऐं कृप्या सत्यनारायण (अविनाशी प्रभु/सतपुरुष) द्वारा रची सृष्टी रचना का वास्तविक ज्ञान पढ़ें।

1. पूर्ण ब्रह्म

2. परब्रह्म

3. ब्रह्म

(उपरोक्त तीनों पुरूषों (प्रभुओं) का प्रमाण पवित्र श्री मद्भगवत गीता अध्याय 15 श्लोक 16,17 में भी है।)पूर्ण प्रभु का मानव सदृश शरीर तेजोमय (स्वज्र्योति) स्वयं प्रकाशित है। एक रोम कूप की रोशनी अरब सूर्यों के प्रकाश से भी ज्यादा है।

यही पूर्ण प्रभु सतलोक में प्रकट हुआ तथा सतलोक का भी अधिपति यही है। इसलिए इसी का उपमात्मक (पदवी का) नाम सतपुरुष (अविनाशी प्रभु)है।पवित्र गीता जी अध्याय 14 श्लोक 3 से 5 तक है। ब्रह्म (काल) कह रहा है कि प्रकृति (दुर्गा) तो मेरी पत्नी है, मैं ब्रह्म (काल) इसका पति हूँ। हम दोनों के संयोग से सर्व प्राणियों सहित तीनों गुणों (रजगुण - ब्रह्मा जी, सतगुण – विष्णु जी, तमगुण - शिवजी) की उत्पत्ति हुई है। मैं (ब्रह्म) सर्व प्राणियों का पिता हूँ तथा प्रकृति (दुर्गा) इनकी माता है। मैं इसके उदर में बीज स्थापना करता हूँ जिससे सर्व प्राणियों की उत्पत्ति होती है। प्रकृति (दुर्गा) से उत्पन्न तीनों गुण (रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव) जीव को कर्म आधार से शरीर में बांधते हैं।

यही प्रमाण अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 तथा 16, 17 में भी है।

गीता अध्याय नं. 15 का श्लोक नं. 1

ऊध्र्वमूलम्, अधःशाखम्, अश्वत्थम्, प्राहुः, अव्ययम्, छन्दांसि, यस्य, पर्णानि, यः, तम्, वेद, सः, वेदवित्।।

अधिक जानकारी के लिए वेबसाइट पर सर्च करे 👇👇www.jagatgurusantrampalji.org

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